Saturday, November 18, 2006

कैसे बताऊं...

दिल बैठा एक कोने मे
मुझसे नाराज़ था
क्यूं जाने दिया उसे
इसका जो हमराज़ था
कैसे तुझे बताऊं
ए दिल-ए-नादान
जहाँ मै हूँ बिका
उसका ही बाज़ार था

निगाहें बैठीं एक कोने मे
मुझसे नाराज़ थी
क्यूं जाने दिया उन्हें
इनकी जो राज़दार थी
कैसे तुम्छें बताऊं
ए रोती निगाहों
जहाँ मै हूँ रोया
उसका ही नशात था

क़दम बैठे एक कोने मे
मुझसे नाराज़ थे
क्यूं जाने दिया उनको
इनके जो सफ़र-ए-यार थे
कैसे तुम्छें बताऊं
ए थमे क़दमों
जहाँ मै हूँ थमा
उसका ही आगाज़ था

ज़िंदगी बैठी एक कोने मे
मुझसे नाराज़ थी
क्यूं जाने दिया उसे
इसकी जो हम - नवाज़ थी
कैसे तुझे बताऊं
ए बिखरी ज़िंदगी
जहाँ मै हूँ बिखरा
उसका ही ख्वाब था

1 Comments:

Blogger Krashed said...

Nice one...

8:35 PM  

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