Saturday, November 18, 2006

माँ

पहाड़ों पे चलता हुआ
एक बादल का टुकड़ा
मेरी तरह किसी को ढूंढता हुआ
एक बादल का टुकड़ा

मेरी ही तरफ़ आता हुआ
वोह बादल का टुकड़ा
मुझसे ही मिलने की कोशिश
वोह कर रहा था

शायद मेरे गाँव से चलकर
वोह मिलने आ रहा था
मुझे देखते ही ख़ुशी से
वोह दौड़ने लगा

पानी से उसका सारा बदन
भीग रहा था
लगता था जैसे पूरे रास्ते
दौड़ रहा था

मुझसे मिलते ही मुझसे मेरा
हाल पूछने लगा
मैने पूछा क्यों मिलने की
कोशिश कर रहा था

बोला तेरी माँ ने तुझसे
मिलने मुझे भेजा है
बेटे को मेरे अपने साथ लाना
ऐसा ही कहा है

उस बादल के टुकड़े मे मुझे
माँ का चेहरा नज़र आ रहा था
धीरे धीरे मै चलने लगा
उस बदल के टुकड़े के पीछे

धीरे से पानी की एक बूँद
चेहरे पे मेरे गिरी
आँखें खोली तो देखा
माँ प्यार से मुझे देख रही है

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