Thursday, March 15, 2007

क्या उसके सिवा साथ ले जाते

आज सुबह उठा तो अपनी बाईं तरफ़ एक चीज़ खोई हुई लगी ..... कमरे का कोना कोना छान मारा, लगा तुम जाते वक़्त कहीं रख गये होगे....पर नहीं मिली. फिर याद आया तुमने कहा था तुम्हारी एक अमानत साथ ले जा रही हूँ जब ज़रूरत नहीं होगी लौटा दूँगी.......

सुबह की रंगत साथ ले जाते
ख्वाब हमारा साथ ले जाते
छूट गयी जो पिछली गली मे
वो आधी अधूरी बात ले जाते

हमारी सुबह मे रंग था तेरा
हक़ीक़त हमारी ख्वाब था तेरा
अज़ीज़ था जो हमको सबसे
क्या उसके सिवा साथ ले जाते

छोड़ गये हो तुम यादें इतनी
बोलो इनको हम कहाँ रखेंगे
दो टुकड़े कर देते, इक रख जाते
दूसरा तुम अपने साथ ले जाते

दरवाज़े पे आँचल छूट गया है
उसमे रख लेना इन यादों को
जिसकी कोई ख़ता नहीं इसमे
क्यूं दर्द उसको और दे जाते

[अरविंद]

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aaj subah utha to apni bayin taraf ek chiz khoyi hui lagi ..... Kamre ka kona kona chaan mara, laga tum jaate waqt kahin rakh gaye hoge....par nahin mili. phir yaad aaya tumne kaha tha tumhari ek amanat saath le ja rahi hun, jab zarurat nahin hogi lauta dungi.......

subah ki rangat saath le jaate
khvaab hamara saath le jaate
chut gayi jo pichli gali me
vo aadhi adhuri baat le jaate

hamari subah me rang tha tera
haqiqat hamari khvab tha tera
aziz tha jo hamko sabse
kya uske siwa saath le jaate

chod gaye ho tum yaaden itni
bolo inko ham kahan rakhenge
do tukde kar dete, ik rakh jaate
dusra tum apne saath le jaate

darwaje pe aanchal chut gaya hai
usme rakh lena in yaadon ko
jiski koi khata nahin isme
kyun dard usko aur de jaate

[arvind]

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