Friday, January 19, 2007

ला के दो...

दर्द गर ऐसा होता है तो थोड़ा सा और ला के दो
धीरे धीरे मारे है वो इश्क़ जैसा ज़हर ला के दो

ना खाने की सुध रहे ना मज़ा शराब मे बाक़ी हो
सिले सिले से जो हैं उन होंठों का रंग ला के दो

ना माँगूँ कुछ खुदा से ना ही कोई दुआ मुझको दो
ना अलग हो होंठो से वो महकती हँसी ला के दो

मुझे ना दो सलाह कोई ना तुम देखो यूँ तरस से
ओढ़ लूं मै जिसे वो गुनगुने अहसास ला के दो

"आशिक़" बदल के देखा हमने , बदलना भी देखा
ना हो जुदा कभी इक ऐसी कोई आरज़ू ला के दो

[अरविंद]

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